शिक्षा में कैसे सार्थक नागरिक के निर्माण की नींव डाली जाए?

शिक्षा में कैसे सार्थक नागरिक के निर्माण की नींव डाली जाए?

प्रकाशित : सालाम दुनिया 24 अगस्त 2015

शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज की रीढ़ होती है। समाज में शिक्षण संस्थान अगर सचेतन और क्रियाशील नागरिक तैयार करने की प्रयोगशाला बन पाए तो समाज की उन्नति निश्चित है। शिक्षण संस्थान नयी पीढ़ी के जीवन को व्यापक मकसद दे सकते हैं। हर व्यक्ति अपने संतान को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से पढ़ाता है। लेकिन नयी पीढ़ी की शिक्षा के मकसद में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों हितों का सामंजस्य होना जरूरी है। शिक्षा से डिग्री और फिर नौकरी पाने का मकसद नयी पीढ़ी को बाज़ार के लिए तैयार होने की नसीहत देता है। स्वार्थ, प्रतिद्वंदिता जैसे तमाम बाजारवादी मूल्य उसकी सोच में जड़ें जमा लेते हैं। ऐसे विद्यार्थी का व्यक्तित्व सामाजिक नहीं बन पाता । उसमें पड़ा आत्मकेंद्रण का बीज उसके ’मैं’ के दायरे को लगातार संकुचित करता रहता है। नौकरी के बाद सुख-सुविधाएं बटोरने की दौड़, दिखावा, विकृत अहं उसे एक अनिश्चित दौड़ का प्रतिभागी बना देते हैं। तब तनाव से पैदा होने वाली हृदय रोग जैसी तमाम बीमारियाँ चोर दरवाजे से जिंदगी में दाखिल होती हैं। शिक्षा से सार्थक जीवन दर्शन का विकास न हो पाने की हालत में मानसिक रोग तथा चारित्रिक कमजोरियाँ इंसान के साथ समाज को भी क्षय रोग की तरह निगलने लगती हैं।
विश्वविद्यालय स्तर पर विषयों के अध्ययन से हासिल ज्ञान के जीवन और समाज में प्रयोग की बात पर सोच विचार करना जरूरी है। यह रवैया विद्यार्थियों की सोच को शोधपरक, सृजनशील और गतिशील बना सकता है। इस पहल से अध्ययन से हासिल ज्ञान के समाज में व्यावहारिक स्तर पर प्रयोग की प्रविधि से संबन्धित संहिता बन सकती है।
लगातार चिंतन, मनन और शोध की ओर नयी पीढ़ी का रुझान समाज को वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर नए सिद्धांतों और विचारों से समृद्ध कर सकता है। नयी पीढ़ी में इस रुझान का बीज उच्च माध्यमिक स्तर से ही डालना जरूरी है। विद्यार्थियों को जब व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्वों के निर्वाह की प्रेरणा दी जाएगी तब कक्षा में पढ़ाये जाने वाले तथ्यों में इन्हीं दायित्वों की गंध रिसने लगेगी। शिक्षक कान्सैप्ट को समझाने के साथ वर्तमान के हिसाब से उनकी सोच को दिशा देकर विद्यार्थियों को जीवन और समाज को बेहतर बनाने की शिक्षा दे पाएंगे। मसलन, कला वर्ग के विषयों में शामिल सामाजिक, सांस्कृतिक मुद्दे अगर समाज की जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याओं से जूझने की राह तलाशने की प्रेरणा से पढ़ाएँ जाएँ तो इन समस्याओं से जूझने के हथियार तैयार करने में नयी पीढ़ी पहल कर सकती है।
वर्तमान शिक्षा से हासिल ज्ञान कच्ची या अधपकी सब्जियों जैसी हैं। इस ज्ञान के प्रयोग संबंधी कोशिश के अभाव में जीवन और समाज का इससे भरण-पोषण संभव नहीं हो पा रहा। शिक्षा पर देश का करोड़ो रुपया व्यय हो रहा है और शिक्षा के सार्थक सामाजिक उद्देश्य के अभाव में पैदा होने वाला ’वैक्यूम’ नयी पीढ़ी को सिर्फ डिग्री और नौकरी की धुरी पर घुमा रहा है। इस राह में सिर्फ भूख और दौड़ है। ज्ञान के प्रयोग का आनंद, सृजन के सुख का एहसास नयी पीढ़ी को हो ही नहीं पाता। व्यापक व्यक्तिगत और सामाजिक उद्देश्य से दी जाने वाली शिक्षा विद्यार्थी को न सिर्फ नौकरी के काबिल बनाती है बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी सामाजिक बनाती है।
शिक्षा की केन्द्रीय धुरी जीवन है। जीवन दृष्टि में समाजिकता का समावेश जीवन को सार्थक बनाता है। जीवन को सार्थक बनाने के लिए दी जाने वाली शिक्षा में विषयों के प्रति अंतर्विषयक रवैया अपनाना जरूरी है। क्योंकि ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, हालात व्यक्ति की सोच, व्यवहार,भाषा, जीवन स्तर को प्रभावित करते हैं। इसलिए विषय के अध्ययन से हासिल ज्ञान से जीवन और समाज को बेहतर बनाने का सार्थक प्रयास ज्ञान को जीवन से जोड़कर देख पाने के नजरिए पर आश्रित है। नयी पीढ़ी में इस नजरिए को विकसित करने के लिए पाठ्यक्रम का नए सार्थक गुच्छों में विभाजन जरूरी है। विद्यार्थियों में विषयों का स्पष्ट ’कान्सैप्ट’ होना और अलग अलग ’कान्सैप्ट’ की समझ से एक ’विजन’ तैयार होना जरूरी है। यही ’विजन’ वह संजीवनी है जो नयी पीढ़ी और समाज में शोधपरक नजरिया तैयार कर सकती है। अलग-अलग विषयों के पाठ्यक्रम को इस साँचे में ढालने के लिए लंबे विचार विमर्श और कार्यशालाओं के आयोजन की जरूरत है। देश के तमाम शिक्षकों, विद्वानों का सामूहिक प्रयास ही शिक्षा व्यवस्था के रथ को सार्थक रह पर ला सकता है।
वर्तमान समय में सार्थक शिक्षा का सवाल मुँह बाए खड़ा है। यह सवाल कई विद्यार्थियों की सोच को दिशा भी दे रहा है। विश्वविद्यालयों में अगर ’कम्यूनिटी सर्विस रिसर्च सेल’ हो और यहाँ विषयों के अध्ययन से हासिल ज्ञान के समाज में प्रयोग करने की विद्यार्थियों द्वारा खोजी गयी युक्तियों को दर्ज़ करने की सुविधा हो तो भविष्य में यही परिपाटी सामाजिक सोच की कई नयी दिशाएँ खोल सकती हैं। सेल के खाते में दर्ज़ की गयी युक्तियाँ देखकर कोई विद्यार्थी उसी सोच से साम्य रखने वाले साथी पा सकता है। यह सेल विद्यार्थियों को उनकी सोच को दिशा देने के काबिल विद्वानों से भेंट करवा सकता है। ताकि अपनी सोच की कमियों को पहचानकर विद्यार्थियों का दल बेहतर योजना बना सके। दल के सदस्य किसी पिछड़े इलाके को चुनकर सर्वेक्षण के जरिये वहाँ की समस्याएँ और शक्तियों को पहचान सकते हैं। किसी कला या कार्य में निपुण व्यक्तियों को मानव संसाधन में बदलकर उनके माल की बिक्री के लिए उसी इलाके के उद्यमी लोगों को प्रशिक्षण दे सकते है। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी ऐसे माल की बिक्री के लिए बाज़ार खोज सकते हैं। कला वर्ग के विद्यार्थी नाटक या नृत्य के जरिये इलाके में सचेतनता लाने का प्रयास कर सकते हैं। बात साफ है कि इस तरह के कार्य के लिए दल में अलग – अलग विषयों के विद्यार्थियों का होना जरूरी है। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी इस काम में उस इलाके के आस-पास के व्यापारियों को शामिल करने की सार्थक राह खोज सकते हैं, ताकि यह योजना आत्मनिर्भर हो सके।
शिक्षा मंत्रालय अपने वेब साइट में ’गोल्डेन पेज’ खोलकर किसी विश्वविद्यालय के ऐसे प्रयास को बढ़ावा दे सकता है। सार्थक प्रयासों की खबर ’गोल्डेन पेज’ में दी जा सकती है। इससे विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिल सकता है। ऐतिहासिक युग में बौद्धों द्वारा ’वोटिव टैब्लेट’ दी जाने की प्रथा को शिक्षा मंत्रालय नए ढंग से चालू कर सकता है। किसी अच्छे कार्य को पूरा करने के बाद बौद्ध इस टैब्लेट में उस कार्य की सूचना देकर उसे बांटते थे। ताकि ऐसा कार्य करने के लिए लोग प्रोत्साहित हों। शिक्षा मंत्रालय किसी सार्थक योजना की समाप्ति पर विश्वविद्यालय, आर्थिक सहयोग देने वाले व्यापारियों और विद्यार्थियों को ’वोटिव टैब्लेट’ देने की रस्म अदा कर सकता है। यह रस्म व्यापारियों और विद्यार्थियों को सामाजिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इस ’वोटिव टैब्लेट’ में दर्ज़ आईडी नंबर से ’गोल्डेन पेज’ का वह पन्ना खुल सकता है जिसपर सम्पन्न किए गए कार्य की खबर मौजूद होगी। इतना ही नहीं विश्वविद्यालय अपने अतिथियों को यह ’वोटिव टैब्लेट’ उपहार के तौर पर दे सकता है जो उसके मान या स्तर का परिचायक बन सकता है। टैब्लेट में एक कार्य के लिए एक स्टार का प्रावधान हो तो कार्यों के साथ ’स्टार’ की संख्या भी बढ़ेगी। ’स्टार’ या सितारे की अवधारणा सिर्फ होटेल का स्तर बताने के लिए ही नहीं बल्कि विश्वविद्यालय का स्तर बताने के लिए भी प्रयुक्त हो पाएगी। इस तरह मानवीय मूल्यों को भी विज्ञापन के लिए एक मंच मिलेगा। साथ ही समाज की उन्नति के कार्य में विद्यार्थी वर्ग भी सरकार के दाहिने हाथ की सी भूमिका निभा पाएगा।

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